फाइलेरिया के कारण बोझिल हो जाता है जीवन, जागरूक बनें और रोग से बचें

फाइलेरिया के कारण बोझिल हो जाता है जीवन, जागरूक बनें और रोग से बचें

• फाइलेरिया से बचने के लिए दवा के सेवन के साथ साफ-सफाई का रखना होगा विशेष ध्यान 

• रोग की चपेट में आ चुके मरीज लोगों को मच्छरदानी में सोने की करते हैं अपील

बक्सर | आज भले ही हम तरक्की की रोज नई नई सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, लेकिन आज भी कई बीमारियां ऐसी हैं जिसने लोगों का जीवन बोझिल बना दिया है। जिनमें फाइलेरिया दूसरे स्थान पर काबिज है। फाइलेरिया न केवल लोगों को कमजोर व लाचार बनाता है, बल्कि इससे विकलांगता का खतरा भी अधिक होता है। दूसरी ओर इस बीमारी की चपेट में आ जाने के बाद धीरे धीरे लोगों की मानसिकता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है। इस रोग से प्रभावित मरीज व उनके परिजनों को हर घड़ी लोगों के द्वारा तिरस्कार करने व मजाक उड़ाने का डर सताता है। वहीं, रोगग्रस्त मरीज अपना जरूरी काम भी सही से नहीं कर पाते हैं। कई मामलों में तो मरीजों का रोजी-रोजगार प्रभावित होता है। इस लिए यह बहुत जरूरी है कि समाज मे रहने वाले शहरी व ग्रामीण इलाके के लोगों को फाइलेरिया व उससे बचाव की जानकारी पहले से हो। ताकि, वह फाइलेरिया से बचाव के लिए पूर्व से ही जागरूक रहें।
दूसरों को मच्छरदानी में सोने की देते हैं नसीहत :
सदर प्रखंड स्थित बरुणा निवासी रामबाबू गुप्ता पिछले आधे दशक से हाथी पांव से परेशान है। इस बीमारी न केवल उन्हें लाचार कर दिया बल्कि शुरुआती दिनों में इसके कारण वह मानसिक रूप से भी कमजोर रहने लगे थे। उनका पैर का सूजन बढ़ने लगा और चलने फिरने में उन्हें परेशानी होने लगी। तब वह इलाज के लिए चिकित्सकों के पास गए, जहां फाइलेरिया की पुष्टि हुई। जिसके बाद उनका इलाज शुरू हुआ। उस समय चिकित्सकों ने घर के सभी सदस्यों को मच्छरदानी में सोने और आसपास साफ-सफाई रखने की सलाह दी। जिसके बाद वह दूसरों को भी इसकी नसीहत देने लगे। वहीं, रामबाबू गुप्ता ने जिले के सभी लोगों से मास्क ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) को सफल बनाने और दवाओं के सेवन अनिवार्य  रूप से करने की अपील की। ताकि, कोई भी व्यक्ति इस बीमारी का दंश न झेल पाए।
फाइलेरिया की गम्भीरता को लेकर करती हैं सचेत : 
बरुणा की ही फूलकुमारी देवी पहले फाइलेरिया और उसके प्रभाव की बातों से अनभिज्ञ थी। करीब 10 साल पहले उन्हें पांव में सूजन के शिकायत की शुरूआत हुई। स्थानीय स्तर पर बहुत इलाज कराया, पर सूजन कम नहीं हुआ। बाद में चिकित्सकों ने उनको फाइलेरिया से ग्रसित होने की बात कही। जिसके बाद वह मानसिक रूप से परेशान रहने लगी। लेकिन, इस रोग से ग्रसित होने के बाद उन्होंने ठानी की अब वह अपने परिवार में किसी को भी इस बीमारी की चपेट में नहीं आने देंगी। जिसके बाद वह घर के अंदर से लेकर बाहर तक साफ-सफाई रखने लगी और सभी को मच्छरदानी में सुलाती। वहीं, दूसरे लोगों को भी फाइलेरिया की गंभीरता को लेकर सचेत करने लगी। साथ ही, साल में एक बार सभी को एमडीए की दवाओं का सेवन कराती और आसपास के लोगों को भी इसका सेवन करने के लिए प्रेरित करतीं।